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BVAAP Vol.17 [2009] >
BVAAP Vol.17(1) [June 2009] >
| Title: | पंजाब के पटियाला क्षेत्र में रहने वाले लोगों की श्वसन पक़्रिया पर पराली के धुंए से उत्पन्न प्रदूषण का प्रभाव |
| Authors: | अवस्थी, अमित अगवाल, रवीन्द मित्तल, सुशील सहाय, शिवराज |
| Issue Date: | Jun-2009 |
| Publisher: | CSIR |
| Abstract: | धान की फसल की कटाई
के बाद उसकी पराली को जला दिया जाता है ताकि उस खेत में अगली फसल उगायी जा सके। खेत साफ करने का यह तरीका किसानों के लिए काफी सस्ता और आसान होता है। परन्तु इससे
बड़े पैमाने पर धुआं निकलता है जो वातावरण और स्वास्थ्य को काफी प्रभावित करता है। इस शोध पत्र में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को खुले खेत में जलाने से
स्वास्थ्य प्रभावों मुख्यतः श्वसन घटकों; (respiratory parameters) पर धुएं के प्रभाव पर किये गये शोध का वर्णन किया गया है। सांस लेते समय छोटे-छोटे कण (SPM)
जोकि हवा में होते हैं, की मात्रा पराली के
जलने से निकलने वाले धुएं से बढ़ जाती हैं। ये कण सांस के साथ फेफड़ों में पहुंच
जाते हैं। इससे स्वास्थ्य सम्बन्धित अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। पराली के
धुएं से श्वसन प्रक़्रिया किस तरह प्रभावित होती है यह जानने के लिए पटियाला (पंजाब) क्षेत्र में
विभिन्न श्वसन घटकों (FEV.FVC etc.) की नियमित रूप से स्पाइरोमीटर यंत्र से जांच की गयी। इसके साथ ही
वातावरण में मौजूद छोटे कणों की मात्रा के आंकड़े हाई वॉल्यूम सेम्पल यंत्र से
एकत्र किये गये। SPM और श्वसन घटकों के
आंकड़े व्यवस्थित योजना के अनुसार अक्तूबर 2006
से जनवरी 2007
के दौरान एकत्र किए गए। शुरुआती जांच से पता चला
है कि SPM की मात्रा सामान्य के मुकाबले पराली जलने के दौरान 33 बढ़ जाती है और
श्वसन घटकों पर इसका प्रभाव कुछ समय बाद देखने को मिलता है। कम आयु वर्ग (14-19) के लोगों में श्वसन घटक बड़े आयु वर्ग (21-33) के मुकाबले ज्यादा प्रभावित
होते हैं। उदाहरण के लिए FVC श्वसन घटकों की मात्रा कम आयु वर्ग में 6 तक घट जाती है जबकि बड़े आयु वर्ग में 2 तक ही घटती है। इसी
तरह अन्य श्वसन घटकों में भी कम आयु वर्ग के मुकाबले बड़े आयु वर्ग में कम अन्तर
पाया गया है।
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| Page(s): | 9-12 |
| ISSN: | 0975-2412 (Online); 0771-7706 (Print) |
| Source: | BVAAP Vol.17(1) [June 2009]
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