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VP Vol.59 [2010] >
VP Vol.59(10) [October 2010] >
| Title: | पक्षियों का प्रवास |
| Authors: | गोरे, मनीष मोहन |
| Issue Date: | Oct-2010 |
| Publisher: | निस्केयर- सी एस आई आर, भारत |
| Abstract: | जान शरद ऋतु खंजन आए,
पाई समय जिमि सुकृति सुहाए।
रामचरित मानस की उपरोक्त पंक्तियों में खंजन पक्षी के प्रवास के बारे में उल्लेख करके तुलसीदासजी ने यह स्पष्ट किया है कि बाहर से आने वाले प्रवासी पक्षियों की जानकारी लोकमानस में बहुत पहले से रही है। नीले गगन में पक्षियों की स्वछंद उड़ान सदियों से हम मनुष्यों को लुभाती रही है। ये आसमान के रंग-बिरंगे यायावर प्राचीन काल से कवियों और लेखकों को आकर्षित करते रहे हैं। प्राचीन भारतीय वांग्मय पक्षियों के वर्णनों से भरे पड़े हैं। भारतीय ग्रंथों के अतिरिक्त दुनिया के अन्य देशों के प्राचीन साहित्यों में भी प्रवासी पक्षियों का उल्लेख मिलता है। |
| Page(s): | 55-59 |
| CC License: | सी सी एट्रीब्यूशन- नॉनकर्मेशियल- नो-डेरिवेटिव वर्क्स 2.5 इण्डिया |
| ISSN: | 0042-6075 |
| Source: | VP Vol.59(10) [October 2010]
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