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Title: वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान लोकप्रियकरण
Authors: गोरे, मनीष मोहन
Issue Date: Feb-2011
Publisher: निस्केयर- सी एस आई आर, भारत
Abstract: "जहां तर्क की स्पष्ट धारा बुराइयों के दलदल में दिग्भ्रमति न हो, जहां सतत् प्रखर हो रहे विचार और कार्य की ओर हमारा मन उन्मुख हो, परमपिता से मेरी प्रार्थना है कि वे ऐसी आजादी से परिपूर्ण स्वर्ग में मेरे देश को उदित करें"। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी कृति गीतांजलि की 'मेरा स्वर्ग' नामक कविता में उपरोक्त विचार और तद्नुसार कार्य-कलाप की चर्चा की है। भारतीय साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का यह एक लघु मगर नायाब प्रसंग है। महाभारत और उपनिषद् जैसे हमारे भारतीय वांग्ड़मय चर्चा-परिचर्चाओं, बहसों, विवादों, प्रश्नों तथा संवादों से भरे हुए हैं। दरअसल चर्चा, बहस और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ही अभिन्न अंग होते हैं।
Description: 21-27
URI: http://hdl.handle.net/123456789/11138
ISSN: 0042-6075
Appears in Collections:VP Vol.60(02) [February 2011]

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