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VP Vol.59 [2010] >
VP Vol.59(09) [September 2010] >
| Title: | बी.टी. कॉटन और बैंगन |
| Authors: | प्रसाद, शुकदेव |
| Issue Date: | Sep-2010 |
| Publisher: | निस्केयर- सी एस आई आर, भारत |
| Abstract: | बीजों से पौधे और पौधों से पुनः बीज प्राप्त करना एक नैसर्गिक प्रक़्रिया है। लेकिन इस प्रक़्रिया में जैवप्रौद्योगिकी के नए आयामों ने कुछ बाधा उपस्थित कर दी है। प्रकारांतर से बहुराष्ट्रीय कंपनियां निर्धन राष्ट्रों के कृषकों पर घातक प्रहार कर रही हैं और उन्हें अनंत काल तक अपने शिकंजे में कसने को आतुर हैं।
वस्तुतः जैवप्रौद्योगिकी जैसे शिल्प विज्ञान के अस्तित्व में आते ही पराजीनी फसलों की अवधारणा पनप चुकी थी क्योंकि किसी पादप/जंतु प्रजाति में सिद्धांततः बाह्य जीनों के प्रवेश का द्वार खुल चुका था। मूल जीनों के काटने और वांछित जीन के कटे टुकड़े से जोड़ने का अस्त्र इस प्रौद्योगिकी ने मुहैया करा दिया था।
परजीनी फसलों का सीधा-सा अर्थ उन पादपों से है जिनको संवर्धन तकनीक से उगाया जाता है और जेनेटिक इंजीनियरिंग के कमाल से उनमें नैसर्गिक जीनों के अतिरिक्त मनोवांछित जीन प्रविष्ट कराए जाते हैं जिससे उनमें रोगरोधिता, कीटरोधिता या विषाणुरोधिता जैसे गुणों का समावेश हो जाता है। इनसे भरपूर फसलें ली जा सकती हैं, पौष्टिकतायुक्त प्रोटीनें डाली जा सकती हैं और प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलने में भी इन्हें सक्षम बनाया जा सकता है।
तमाम अच्छाइयों के बावजूद इनके पार्श्व प्रभावों अथवा घातकता की जांच अभी की जानी बाकी है। आनुवंशिक प्रदूषण की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। फसलों को नष्ट करने वाले खरपतवारों में यदि ये जीनें प्रवेश कर जायं तो वे भी उसी अनुरूप में प्रबल हो जायेंगे और फिर उन्हें नष्ट करने यानि फसलों को खरपतवाररोधी बनाने के लिए क्या उनमें अन्य जीनें डाली जायं? फिर यह सिलसिला आखिर कहां तक चलेगा? यह मुद्दा अभी भी विवादग्रस्त है और विज्ञानियों में मतैक्य नहीं है। निष्कर्ष अभी आने बाकी हैं। |
| Page(s): | 54-58 |
| CC License: | सी सी एट्रीब्यूशन- नॉनकर्मेशियल- नो-डेरिवेटिव वर्क्स 2.5 इण्डिया |
| ISSN: | 0042-6075 |
| Source: | VP Vol.59(09) [September 2010]
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