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    <title>NISCAIR Online Periodicals Repository Collection: VP Vol.59(11) [November 2010]</title>
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      <title>The Collection's search engine</title>
      <description>Search the Channel</description>
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      <title>लेंस विहीन फोटोग्राफी यानी होलोग्राफी</title>
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      <description>Title: लेंस विहीन फोटोग्राफी यानी होलोग्राफी
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: मुखर्जी, प्रदीप कुमार
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: अपने माता-पिता के साथ मॉल में गया विक्रांत आज बहुत खुश था। उसके जन्मदिन पर उसके माता-पिता ने उसका मनपंसद टेडी बीयर लेकर देने का वायदा किया था। उसे आइसक्रीम, पॉपकॉर्न आदि दिलाने के बाद उसके माता-पिता ने घर के लिए कुछ जरूरी समान खरीदा। अब बिल बनाने की बारी आई। विक्रांत ने देखा तो हैरान रह गया। बिल बनाने वाला व्यक्ति पैकेट पर रोशनी डालकर कुछ देखता, फिर कम्प्यूटर  पर एंट्री करता।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 53-56</description>
      <pubDate>Fri, 29 Oct 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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      <title>भारत में डॉक्यूमेंट्री आंदोलन के स्तंभ : डा. एस कृष्णास्वामी</title>
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      <description>Title: भारत में डॉक्यूमेंट्री आंदोलन के स्तंभ : डा. एस कृष्णास्वामी
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: सिन्हा, अनुज
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: डाक्यूमेंट्री फिल्मकार, प्रोड्यूसर, निर्देशक और लेखक पद्मश्री डा. एस कृष्णास्वामी ने विगत पांच दशकों में उल्लेखनीय शैक्षिक और विज्ञान फिल्मों की एक श्रृंखला का निर्माण किया है। कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क में फिल्म और टेलीविजन का अध्ययन करने के बाद उन्होंने प्रो. एरिक बरनाउ के सान्निध्य में काम किया और प्रतिष्ठित पुस्तक इंडियन फिल्म (कोलंबिया यूनीवर्सिटी प्रेस 1963 एवं ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस 1980) लिखी। इसके बाद उन्होंने सन् 1964 में कृष्णास्वामी एसोसिएट्स की स्थापना की। 45 वर्ष लंबे अपने कैरियर में उन्होंने करीब 400 लघु फिल्में बनाई। उन्होंने विश्व भर में अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों को संबोधित किया और अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सवों में अनेक मानद पद ग्रहण किए।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 47-51</description>
      <pubDate>Fri, 29 Oct 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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      <title>विज्ञान साहित्य परिचय</title>
      <link>http://nopr.niscair.res.in/handle/123456789/11279</link>
      <description>Title: विज्ञान साहित्य परिचय
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: मानव की भाषा से पहले ध्वनि ने अपना अस्तित्व बताया और ध्वनि की यह आवृत्ति धीमे-धीमे निरन्तर होती रहती है और तब बनता है एक संगीत और उनकी बहन कविता। ऐसा नहीं है कि बच्चों को गद्य को समझने में कठिनाई आती है परन्तु कविता से बाल मन-मस्तिष्क का नाता सतत् व मजबूत रहा है बशर्ते कि कविता में सरलता, आवृत्ति व लयबद्धता हो। यूं भी बालमन खेल, मौजमस्ती और सरसता में अधिक रमता है और रमता रहेगा भी, फिर चाहे पंचतंत्र की कहानियों की पुस्तकें हों या रेडियो-टी.वी. की जुगलबंदी। वर्तमान परिदृश्य में कम्प्यूटर, इन्टरनेट व विभिन्न रंग-बिरंगे वीडियो खेल के साथ-साथ पुस्तकों का भी अपना एक अद्वितीय, निराला व महत्वपूर्ण स्थान है जो प्रकाशपुंज की तरह अपनी चमक व गरिमा से हमारे विश्व को गतिमान रखेगा।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 37-44</description>
      <pubDate>Fri, 29 Oct 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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      <title>खूबसूरत रंगीन लेंस</title>
      <link>http://nopr.niscair.res.in/handle/123456789/11278</link>
      <description>Title: खूबसूरत रंगीन लेंस
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: पाण्डेय, विजन कुमार
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: एक आम आदमी की समझ में कांच का अर्थ होता है कोई पारदर्शक, ऊष्मीय तथा विद्युतीय  तौर पर कुचालक ठोस वस्तु जो गिरने पर आसानी से टूट कर बिखरने वाली हो। आज हम सूचना प्रौद्योगिकी के युग में रह रहे हैं और इस युग की विशेषता सूचनाओं के अति तीव्र गति से संचरण में है। आज हम न केवल पृथ्वी पर किसी एक देश/प्रदेश से दूसरी जगह संपर्क कर सकते हैं बल्कि अंतरिक्ष से भी पृथ्वी पर सीधा संचार कर सकते हैं। इस संचार  एवं बातचीत के दौरान हम एक दूसरे को देख भी सकते हैं। क्या आप जानते हैं कि यह कैसे संभव हुआ? इस क्रांति के लिए जिम्मेदार है प्रकाश संचरण की खोज। आखिर यह प्रकाश संचरण है क्या? वस्तुतः प्रकाश संचरण में सूचनाओं को पारंपरिक विद्युत संकेतों के बदले प्रकाशीय संकेतों के माध्यम से भेजा जाता है। इन संकेतों को भेजने का माध्यम धात्वीय तार न होकर प्रकाशीय तंतु होते हैं। आप जानकर आश्चर्य करेंगे कि ये प्रकाशीय तंतु और कुछ नहीं बल्कि पारंपरिक रूप से खिड़कियों, सजावट के सामान व बर्तनों में प्रयोग में आने वाले कांच की तरह के विशेष संगठन वाले कांचीय पदार्थ ही होते हैं। धात्वीय तारों के मुकाबले इन प्रकाशीय तंतुओं या फाइबरों में से कई गुना अधिक सूचनाएं, अत्यंत तीव्र गति से तथा न्यूनतम ह्रास (0.28 डी बी/किमी.) के साथ भेजी जा सकती हैं। इस कांच ने न केवल सूचना प्रसारण में योगदान दिया है बल्कि आज गगनचुंबी इमारतों के निर्माण  में उन्हें मनमोहक छवि प्रदान करने में भी क्रांति ला दी है।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 57-60</description>
      <pubDate>Fri, 29 Oct 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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