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    <title>NISCAIR Online Periodicals Repository Collection: VP Vol.60(01) [January 2011]</title>
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      <title>The Collection's search engine</title>
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      <title>विज्ञान समाचार</title>
      <link>http://nopr.niscair.res.in/handle/123456789/11132</link>
      <description>Title: विज्ञान समाचार
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: कोहली, दीपक
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 50-52</description>
      <pubDate>Wed, 29 Dec 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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      <title>अद्भुत एवं बहुपयोगी जैवसम्पदा : पर्णांग</title>
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      <description>Title: अद्भुत एवं बहुपयोगी जैवसम्पदा : पर्णांग
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: लाल, अलका कुमारी, बृज; सिंह, आर.डी.
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: पृथ्वी विविध एवं अद्भुत जैवसम्पदा का एक प्राकृतिक स्रोत है। इस असीम विविधता के अन्तर्गत नाना प्रकार की वनस्पतियों एवं जन्तुओं का समावेश है। चाहे पादप हो या जन्तु समुदाय प्रत्येक वर्ग की अपनी एक विशष्टि पहचान है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर सम्पूर्ण पादप जगत को अपुष्पीय तथा पुष्पीय पादप समुदायों में विभाजित किया गया है। जीवन उद्भव के दौरान धरातल पर जब जीवों का नामोनिशान नहीं था, और पृथ्वी केवल धूलकणों, विभिन्न प्रकार की गैसों तथा जल से निमग्न थी, उस समय सर्वप्रथम हरे तन्तुमय शैवाल का परिवर्धन हुआ तथा धीरे-धीरे क्रमिक विकास द्वारा पेड़-पौधों की उत्पत्ति हुई। इस क्रमिक विकास के दौरान अपुष्पीय समुदाय में संवहनीय तंत्र का विकास हुआ और प्रथम संवहनीय तंत्रयुक्त अपुष्पीय समुदाय को पर्णांग अर्थात् टेरिडोफाइट्स के नाम से जाना गया। इस पादप समुदाय का उल्लेख आज से करीब चालीस करोड़ वर्ष पहले जीवाश्म के रूप में मिलता है। पुष्पविहीन वर्ग में पर्णांग सर्वाधिक विकसित समुदाय है। उद्भव के करोड़ों वर्ष बाद भी यह स्वतंत्र एक युग्मित युग्मकोद्भिद (गैमिटोफाइट्स) के रूप में अस्तित्व में है जो बाद में द्विगुणित बीजाणुभिद् (स्पोरोफाइट्स) बनाते हैं। युग्मकोद्भिद तथा बीजाणुभिद् एक दूसरे से काफी भिन्न हैं। इस प्रकार का विशिष्ट जीवन चक्र पर्णांगों की एक मुख्य विशेषता है।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 43-46</description>
      <pubDate>Wed, 29 Dec 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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      <title>वृक्षों पर खेती</title>
      <link>http://nopr.niscair.res.in/handle/123456789/11130</link>
      <description>Title: वृक्षों पर खेती
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: कोहली, दीपक
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: वृक्ष पर खेती – है न आश्चर्यजनक तथ्य, मगर यह सत्य है कि पेड़ों पर खेती आदिकाल से चली आ रही है और वह खेती है लाख की खेती, जो वृक्षों पर की जाती है। &#xD;
लाख एक प्राकृतिक राल है बाकी सब राल कृत्रिम हैं। इसी कारण इसे 'प्रकृति का वरदान' कहते हैं। लाख के कीट अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं तथा अपने शरीर से लाख उत्पन्न करके हमें आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। वैज्ञानिक भाषा में लाख को लेसिफर लाखा कहा जाता है। 'लाख' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'लक्ष' शब्द से हुई है, संभवतः इसका कारण मादा कोष से अनगिनत शिशु क्ड़ों का निकलना है। लगभग 34 हजार लाख के कीड़े एक किग्रा. रंगीन लाख तथा 14 हजार 4 सौ लाख के कीड़े एक किग्रा. कुसुमी लाख पैदा करते हैं। अथर्ववेद में भी लाख की चर्चा है। महाभारत काल में लाक्षागृह का वर्णन है जो पाण्डवों को मारने के लिए बनाया गया था, क्योंकि लाख की जल्दी जलने की प्रवृत्ति होती है। मुगल सम्राट अकबर के 'आइने-अकबरी' में भी लाख के गुणों का उल्लेख मिलता है।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 36</description>
      <pubDate>Wed, 29 Dec 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
    </item>
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      <title>पालक वास्तव में पालक है</title>
      <link>http://nopr.niscair.res.in/handle/123456789/11129</link>
      <description>Title: पालक वास्तव में पालक है
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Authors: मिश्र, अनिल कुमार
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Abstract: जून 2009 में मैंने युवा SLP के तहत Resource Person के रूप में शिक्षा निदेशालय दिल्ली के शिक्षकों के साथ विचार-विमर्श किया और अनुभव किया कि Motivation अति आवश्यक है। अतः स्वस्थ भावी पीढी् तैयार करने हेतु विचार लिपिबद्ध  करता हूँ। विज्ञान प्रगति वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने में महत्वपूर्ण रोल अदा करती है।&#xD;
"पालक वास्तव में पालक है" विज्ञान ने भी प्रमाणित किया है कि भोजन का हमारी मनः स्थिति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेदानुसार भोजन में पांच गुण होने चाहिए।
&lt;br/&gt;
&lt;br/&gt;Page(s): 35</description>
      <pubDate>Wed, 29 Dec 2010 22:58:59 GMT</pubDate>
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